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इंसान एक चिराग़ के मीस्ल हैं

इंसान एक चिराग़ के मीस्ल हैं

इंसान एक चिराग़ के मीस्ल हैं।एक शख्स हजरत इमाम अली रज़ी अल्लाहो ताला अनहो की खिदमत में आया अर्ज़ करने लगा।
या अली आप बार-बार फरमाते हैं। अखलाक से बात किया करो लोगों से अखलाक से मिला करो।
और अपनी सीरत अच्छी रखा करो , और अपनी अल्फाज मीठी रखा करो। उस शक्स ने कहा क्यू अखलाक इंसान के लिए क्यों जरूरी है।
बस यह कहना था।तो,हजरत इमाम रज़ी अल्लाहो ताला अनहो ने फरमाया, यह जो सामने चिराग जल रहा है।
इसे देख रहे हो उसने कहा हां या अली, इमाम ने फरमाया इंसान एक चिराग़ के मीस्ल है।
जैसे यह चिराग खुद रोशन नहीं , और इसकी लौ जलकर रोशनी देती है। ऐसे ही इंसान किसी इंसान से नहीं, बल्कि इंसान से जुड़े औसाफ से जुड़ते हैं। और खुबयों से जोड़ते हैं।
कोई इंसान खूबसूरती से जुड़ा होता है।तो कोई इंसान की दौलत से । कोई इंसान की इज्जत से जुड़ा होता है। तो कोई इंसान की अखलाक से,
ऐ शख्स याद रखना जिस शख्स के औसाफ जितनी हसीन होंगे, और बुलंद होंगे ।वह इंसान उतना ही क़ीमती होगा।
और लोग उस से उतना ही जुड़े हुए होंगे। और जो इंसान अपने वजूद में औसाफ कम रखेगा। तो लोग उस इन्सान से दूर ही रहेगा। याद रखना दौलत ,इज्जत ,शोहरत ,और हुस्न ,इसका ताल्लुक इंसान से भी है।और तकदीर से भी।
यह आने और जाने में देर नहीं करती लेकिन अखलाक का ताल्लुक और सीरत का ताल्लुक इंसान के वजूद से है। जो कोई किसी से छीन नहीं सकता।
जो चीज इंसान किसी दौलत से खरीद ना सके। वह अपने अखलाक से खरीद सकता है।
जो इंसान अपने वजूद में अखलाक की लौ जलाता है।
अपनी सीरत की रोशनी से जमाने को रोशन करता है। उससे यह जमाना कभी जुदा नहीं होता।
और जैसे इस चिराग की लौ को बुझाने से अंधेरा हो जाएगा,वैसे ही अखलाक के लौ बुझने से इंसान अकेला हो जाएगा।
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