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ठगों की ठग बुद्धि से बचों क्यूंकि सांप को भी छोटी-छोटी चींटियां खा जाती

ठगों की ठग बुद्धि से बचों क्यूंकि सांप को भी छोटी-छोटी चींटियां खा जाती

ठगों की ठग बुद्धि से बचों क्यूंकि सांप को भी छोटी-छोटी चींटियां खा जाती।एक नगर में एक कर्मकांडी पंडित रहता था.उसने एक बार माघ के माह में जब की ठंडी हवाएं चल रही थी।आकाश बादलों से घिर रहा था।

हल्की-हल्की बूंदी पड़ रही थी।

एक गांव में जाकर अपने यजमान से एक पशु मांगा।यजमान ने अपने पुरोहित को एक मोटा बकरा दे दिया।

पंडित उस बकरे को लेकर अपने शहर की ओर चल पड़ा ।वह लेकर उसे चला ही था कि मार्ग में पंडित को कई ठग मिले। ठगों ने बकरे को देखकर आपस में कहा, “वाह! इस पशु की भोजन से ही आज आनंद लें। हमें इस पंडित से यह बकरा ठगना चाहिए।”
इस प्रकार उन्होंने मिलकर एक योजना बनाई। उनमें से एक ने भेष बदलकर उस पंडित के सामने से आते हुए कहा। “ओ मूर्ख पंडित!तुम एक पंडित हो कर भी एक गंदे कुत्ते को कंधे पर ले जा रहे हो। कहां भी गया हैं ।कुत्ता मुर्गा ऊंट गधा, यह सब छूने के योग्य नहीं होते।

पंडित जी! गुस्सा क्यों करते हो ? जाओ अपने रास्ते जाओ वह पंडित उसे वहीं पर छोड़ कर आगे बढ़ गया अभी वह कुछ देर ही चला था की तभी उसे दूसरा ठग सामने से आता दिखाई पड़ा उसने पास आकर कहा.
,हे पंडित जी? यह कितने दुख की बात है कि तुम मरे हुए बछड़े को कंधे पर उठाए जा रहे हो।

पंडित ने यह सुनकर कहा , “अरे क्या तुम्हें यह बकरा नजर नहीं आता जो इस से मरा हुआ बछरा बता रहे हो”उसने कहा, “देखो पंडित जी! गुस्सा में न आओ मुझे इस से क्या लेना-देना है? जाओ अपने घर जाओ।”

इस प्रकार इस प्रकार पंडित वहां से भी चल पड़ा, तो आगे थोड़ी ही दूर पर उसे भेष बदले हुए तीसरा ठग मिला और कहने लगा, ”अरे भैया ! यह क्या तुम इस गधे को कंधे पर लादे चले आ रहे हो।”
“क्या गधाहै? ”पंडित ने आश्चर्य पंडित से उस ठाग की ओर देखा और फिर किसी गहरी सोच में पड़ गया। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।
“हां महराज! यह गधा ही तो है। इसमें भला पूछने वाली कौन सी बात है?”

यह सुनकर पंडित चिंतित हो गया ।उसे इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया था कि यह कोई बकरा नहीं है हां या कोई भूत परेत भी हो सकता है जो पल पल में अपना नया रूप धारण कर लेता है।

डर के कारण पंडित ने बकरा उसी जंगल में फेंक दिया और खुद तेजी से भाग निकला। वे तीनों ठग अपनी जीत पर खुश थे। उन्होंने सब बकरे को खा कर खूब आनंद लिया।

इसीलिए कहा जाता है ,कि बुद्धिमान बनो ठगों से बचो सांप को भी छोटी-छोटी चींटियां खा जाती है।

2 replies on “ठगों की ठग बुद्धि से बचों क्यूंकि सांप को भी छोटी-छोटी चींटियां खा जाती”

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