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रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब

रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब

रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब, इस्लाम  के सबसे  मुबारक महीने रमजान की शुरूआत चांद के दीदार के साथ होती है।

रमजान मुबारक का महीना इस्लाम मे खास अहमियत रखता है।

इस माह में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग पूरे महीने रोजा रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं।

इस मुबारक महीने मे रोजा रखने वाले रोजदार सुबह सादिक से पहले तक सहरी करके रोजे की नीयत करके रोजा रखने की शुरूआत करते है.व शाम को सूरज छिपने के बाद इफ्तार करते हैं।

रोजा रखने के दौरान रोज़दार पांचो वक्त की नमाज पढ़ते हैं व अल्लाह से दुआएं करते है।

तो आइये हम रोज़ा रखने के सवाब के बारे मे जानते हैं।

रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब,

(अल्लाह तआ़ला इर्शाद फ़रमाता है,

ऐ,इमान वालों तुम पर रोज़े फर्ज किए गए, जैसे अगलों पर फर्ज़ कीऐं गऐं थे की कहीं तुम्हें परहेज़ गारी मीले।)

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

( 1) जो ईमान और नियते सवाब के साथ रमजान के रोजे रखेगा उसके पिछले गुनाह मिटा दिए जाएंगे।

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

( 2) जिसने रमजान के रोजे रखें और उस के हुक़ूक़ को पहचाना और उसकी हिफाजत की तो उसके पिछले गुनाह मिटा दिए जाएंगे।

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

( 3) पांचों नमाज़े और जुमुआ और अगले जुमुआ तक और रमज़ान और अगले रमजान तक के गुनाहों के कफ्फ़ारा है। जबकि बन्दा कबीरा गुनाहों का इरतेकाब न करें।

( 4) तुम्हारे पास बरकतों वाला महीना माह-ए-रमजान आ गया जिसके रोज़े अल्लाह ताला ने तुम पर फ़र्ज़ किए हैं।

इस महीने में आसमान के दरवाजे खोल दिए जाते हैं जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इस महीने में सर्कस सयातीन को कै़द कर दिया जाता हैं।

इस महीने में एक ऐसी रात है जो हजार रातों से बेहतर है। जो इस रात की भलाई से महरुम रहा ,वह हर भलाई से महरूम रहा।

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

( 5) बेशक यह महीना तुम्हारे पास आ गया है। इस महीने में एक रात है ,

जो हजार महीनों से बेहतर है। जो उसके खैर से महरूम रहा वह हर भलाई से महरूम रहा।
उसकी भलाई से बदनसीब ही महरूम रहता है।

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ
( 6) येह रमज़ान तुम्हारे पास आ गया है। इसमें जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं ,

और जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं ,
और शयातीन को कै़द कर दिया जाता हैं।

महरूम है वह शख्स जिसने रमजान को पाया और उसकी मगफिरत न होई ।

जबकि उसकी रमज़ान में मग़फीनत न हुई तो कब होगी।

( 7) अगर बंदे जान ले की रमजान में क्या है तो मेरी उम्मत ज़रुर यह तमन्ना करती कि पूरे साल रमज़ान हो

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

( 8) बेशक जन्नत को 1 साल की इब्तिदा से दूसरे साल तक रमज़ान की आमद के लिए बुखुर की धुनी दी जाती है। और सजाया जाता है। फिर रमजान की पहली रात आती है तो अर्श के नीचे से हवा चलती है जिसे मुसीरह कहा जाता है। तो जन्नत के पत्ते और दरवाजे की पट हिलने लगती है।

रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब,

और उससे ऐसी दिलकश आवाज पैदा होती है कि किसी ने उस जैसी आवाज पहले नहीं सुनी होगी। तो हुरेइन बाहर निकलती है और जन्नत के बालकोनी पर खड़े होकर निदा देती है।

कोई है अल्लाह عزوجل को पुकारने वाला ताकि वह उसकी शादी कराएं। फिर वह पूछती है ऐ रिज़वान ए जन्नत यह कौन सी रात है। तो हज़रत सैय्यदना रज़वान علیہ السلام उनकी आवाज पर लब्बैक कहते हुए जवाब देते हैं।

यह रमज़ान की पहली रात है उम्मते मोहम्मदी ﷺ के रोज़ेदारों लिए जन्नत के दरवाजे खोल दिए गए हैं।

और अल्लाह عزوجلफरमाता ऐ रीज़बान जन्नत का दरवाजा खोल दो

ए मालिक علیہ السلام जहन्नम के दरवाजा बंद कर दो

ऐऐजीब्रील अलैहिस सलाम जमीन पर जाओ और सर्कस शयातीन को जंजीरों में बांधकर समुंदर में डाल दो ताकि मोहम्मद मुस्तफा ﷺकी उम्मत को रोज़े में फसाद न डालें।

फिर अल्लाह عزوجلरमज़ान की हर रात में एक मुनादी को 3 मरतबह यह निदा करने का हुक्म इरशाद भरमाता है।

कोई है मांगने वाला जिसकी मैं मुराद अुता करूं, कोई है तोबा करने वाला जिसकी तोबा कुबूल करु।

कोई है मगफिरत चाहने वाला जिसको मैं बख्श दूं। कोई है जो ऐसे ग़नी को कर्ज दे जो मोहताज नहीं। और ऐसा देने वाला जो जरा भर कमी न करें।

फ़रमाने मुस़्तफ़ा ﷺ

(9) और अल्लाह عزوجل रमज़ान के हर दिन में इफ्तारी के वक्त दस लाख ऐसे बन्दों को जहन्नम से आजाद फरमाता है जिस पर जहन्नम वाजिब हो चुकी होती है।

फिर जब रमजान का आखरी दिन आता है तो अल्लाह عزوجل रमजान की पहले दिन से आखरी दिन तक आजाद किए गए बंदों के बराबर लोगों को जहन्नम से आजाद फरमाता है।

और जब शबे कद्र आती है तो अल्लाह عزوجل जिब्राइल अलैहिस्सलाम को हुक्म देता है तो वह मलाएका के एक जमाअत के साथ जमीन पर उतरते है।

और उनके साथ सब्ज़ झंडा होते हैं जो काबे की छत पर गाड़ देते हैं।

जिब्राइल अलैहिस्सलाम के सौ पर हैं जिसमें से दो पर सिर्फ उसी रात को फैलाते हैं। और वह मशरीकों मग़रीबों को ढाप लेते हैं।

अल्लाह عزوجلफरमाता है ऐ मेरे बन्दों मुझ से मांगो ।

मेरी इज़्ज़त वव जला की क़सम! तुम इकट्ठे होकर अपनी आखिरत के लिए जो कुछ भी मुझसे मांगोगे मैं तुम्हें आता फरमाऊंगा ।

और दुनिया के लिए जो कुछ भी मांगोगे तो उसमे से जो तुम्हारे लिए बेहतर होगा वह अता फरमा लूंगा।
और मुझे अपनी इज़्ज़त क़सम मैं तुम्हारी ऐबों पर परदा डालूंगा।

मुझे अपनी इज़्ज़त की क़सम!
मैं तुम्हें हक़दारों के सामने हरगिज़ रुसवा जलील नहीं करूंगा। मग़फिरत यातफता लौट जाओ।

तुमने मुझे राज़ी कर लिया और मैं तुमसे राज़ी हो गया। फिर फि़रिश्ते अल्लाह عزوجلकी इस उम्मत के लिए उनके रमज़ान के बाद इफ्तार करने पर की जाने वाली आता पर खुशियां मनाते हैं।

रमज़ान में रोज़ा रखने का सवाब,

DEEN-E-NABI ﷺ