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When is Engineer Day celebrated? In Hindi, अभियंता दिवस

अभियंता दिवस कब मनाया जाता है?

भारत में प्रत्येक वर्ष 15 सितम्बर को ‘अभियन्ता दिवस’ अथवा ‘इंजीनियर्स डे’ के रुप में मनाया जाता है। इसी दिन भारत के महान् अभियंता (इंजिनीयर) और ‘भारत रत्न‘ प्राप्त मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म दिवस होता है। आज भी मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को आधुनिक भारत के विश्वकर्मा के रूप में बड़े सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है।

अभियन्ता दिवस का इतिहास:

101 वर्ष का यशस्वी जीवन जीने वाले मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया सदैव भारतीय आकाश में अपना प्रकाश बिखेरते रहेंगे। भारत सरकार द्वारा 1968 ई. में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जन्म तिथि को ‘अभियंता दिवस’ घोषित किया गया था।

अभियंता (इंजिनीयर) किसे कहते है?

इंजिनीयर को हिंदी में इंजिनीयर अभियंता कहा जाता है। अभियंता (इंजीनियर) वह व्यक्ति है जिसे अभियाँत्रिकी की एक या एक से अधिक शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त हो अथवा जो कि व्यावसायिक रूप से अभियाँत्रिकी सम्बन्धित कार्य कर रहा हो। कभी कभी इन्हे यंत्रवेत्ता भी कहा जाता है।

अभियान्त्रिकी (इंजीनियरिंग) क्या है?

अभियान्त्रिकी (Engineering) वह विज्ञान तथा व्यवसाय है जो मानव की विविध जरूरतों की पूर्ति करने में आने वाली समस्याओं का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। इसके लिये वह गणितीय, भौतिक व प्राकृतिक विज्ञानों के ज्ञानराशि का उपयोग करती है।

इंजीनियरी भौतिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करती है, औद्योगिक प्रक्रमों का विकास एवं नियंत्रण करती है। इसके लिये वह तकनीकी मानकों का प्रयोग करते हुए विधियाँ, डिजाइन और विनिर्देश प्रदान करती है।

इंजीनियरिंग से सम्बंधित विषयों की सूची:

आजकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बहुत से विद्यार्थी अपना करियर बनाना चाहते हैं। इंजीनियरिंग से सम्बंधित अनेक विषय होते हैं जिनमे इंजीनियरिंग से सम्बंधित समस्या के समाधान के बारे में बताया जाता है। जिससे छात्रों को किसी प्रकार की परेशानी ना हो। इंजीनियरिंग से सम्बंधित महत्वपूर्ण विषय निम्नलिखित है:

इंजीनियरिंग से सम्बंधित महत्वपूर्ण विषय:

  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (सिविल इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (बिओमेडिकल इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (बायोटेक्नोलॉजी)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (कंप्यूटर इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (कंप्यूटर साइंस)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग)।
  • बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (बीटेक) (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (सिविल इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (एयरोस्पेस इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (इंजीनियरिंग इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (बायोटेक्नोलॉजी)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (केमिकल इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलेकम्युनिकेशन्स इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग)।
  • मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (ऍम टेक) (एनर्जी इंजीनियरिंग)।

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ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का सबरो इम्तिहान का वाकिया|Examination in hindi.

ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का सबरो इम्तिहान का वाकिया

आज से हज़ारों साल पहले मुल्क़ के शाम में एक कौम रहा करती थी. उस कौम का नाम सुरान था.

और अल्लाह उस कौम के इसलाह के लिए एक नबी मबुउस किया जिसको ज़माना आज भी अय्यूब अलैहिस्सलाम के नाम से पहचानता है.

ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम बहुत मालदार बहुत खूबसूरत अपने क़बीले के सरदार थे.

और निहायत ही इबादत गुज़ार थे आपके सात बैटे और सात बेटियां हुआ करते थी.

आपकी इज़्ज़त और मर्तबा आलम यह था के आप जहां से भी गुज़रते थे लोग खड़े होकर आपका इस्तक़बाल किया करते थी.

इमाम अली रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु ने फ़रमाया.

जब अल्लाह किसी को अजीज़ रखता है तो उसे सब्र से आज़माता है.

बस अल्लाह ने अपने बंदे अय्यूब अलैहिस्सलाम का इम्तिहान लेना शुरू कर दिया.

अय्यूब अलैहिस्सलाम के सारे औलाद मर गए, और सारी दौलत ख़त्म हो गई.

और उसके साथ-साथ अल्लाह ने अय्यूब अलैहिस्सलाम को ऐसी बीमारी दे दी,
के अय्यूब अलैहिस्सलाम का गोश्त गलने लगा.
यहां तक की हड्डियां तक आशना होने लगी.

बस दुनिया ने अपना रुप बदलना शुरू कर दिया वह लोग जो ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की इज़्ज़त किया करती थी…

खड़े होकर इस्तक़बाल करती थी वह लोग ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की तोहीन करने लगे.
यह कहने लगे कि अल्लाह इससे नाराज़ है.

अल्लाह का अजाब है अयूब पर यह कोई नबी नहीं बल्कि यह बेइंतिहा गुनहगार है.
यहां तक की अय्यूब अलैहिस्सलाम से कोई बात करना तक नहीं चाहता था.

अल्लाह का नेक नबी मुतमईन रहा और मुसलसल अल्लाह का जिक्र अल्लाह का शुक्र करता रहा.

वह लोगों ने यह फैसला किया जो बीमारी अय्यूब को है ऐसा ना हो कि ये हमारे बच्चों को हो जाए.

उठाओ अय्यूब को इसे हमारे मोहल्ले में रहने का कोई हक नहीं.

बस लाठी और कपड़े में लपेटकर अय्यूब अलैहिस्सलाम को कचरे के ढेर पर फेंक आते हैं.

ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के साथ उसकी बीवी और अय्यूब मुत्मइन रहकर अल्लाह का जिक्र और शुक्र करते हैं.

जब खाने के लिए कुछ नहीं बचा तो ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की जौज़ा लोगों के घर जाकर काम किया करती थी.

और जो थोड़ी सी उजरत मिला करती थी उससे ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का इलाज कराती थी.खर्ची चलाती थी.

लेकिन ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम अल्लाह के जिक्र शुक्र में मशरूफ रहे.

तारीख़ में लिखा 12 माह 18 माह मुसलसल ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी बढ़ती रही.

एक दिन आपकी बीवी ने कहा ऐ अल्लाह के नबी है आप अल्लाह से दुआ क्यों नहीं करते कि अल्लाह आप को शिफ़ा अता करें.

तो ह़ज़रत अय्यूब ने मुस्कुरा कर कहा मुझे यह बताओ मैंने खुशहाली में कितने बरस गुजारे.

उनके बीवी ने कहा तकरीबन 80 साल तो आप रोने लगे और कहां 80 साल खुशहाल रहे खुश रहे.

अभी 1 साल से अल्लाह ने इम्तिहान लिया तो हिम्मत को खत्म कर दुं.

जब तक अल्लाह अपने बंदे को आजमाना चाहे मैं इम्तिहान दूंगा… यहां तक कि ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के जिस्म पर जो जख्म हुआ करती थीे उस में कीड़े पड़ गए.

और अगर कोई कीड़ा गिर जाता था तो ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम उसे उठाकर जिस्म पर रख देते थे.

और कहते थे शायद तुम्हारा रिज़्क़ अल्लाह ने मेरे जिस्म में रखा है.तुम खाओ अगर अल्लाह की यह मर्जी है तो.

यहां तक लोगों ने ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीवी को काम देना भी बंद कर दिया.

लोगों ने यह कहा कि ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीवी हमारे घरों में आती है,तो
ऐसा ना हो कि वह अय्यूब के साथ रहती है और यह बीमारी कहीं हमारे बच्चों को ना लग जाए.

इसको कोई भी मोहल्ले में काम करने नहीं बुलाएगा.

बस ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की जौज़ा रो-रो कर कहने लगी.

ऐ अल्लाह के नबी अल्लाह से दुआ करें.
अय्यूब अलैहिस्सलाम ने हाथ उठाकर कहा.

ऐ अल्लाह यक़ीनन तू रह़म करने वाला है अपने बंदे पर रहम कर.

जब यह कहना था तो आवाज़ें ग़ैब आई अय्यूब अपने पांव को ज़मीन पर मारो वहां से चश्मा निकलेगा उस से नहाओ.

जब ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने अपना पांव ज़मीन पर मारा तो वहां से एक चश्मा नमुदार हुआ.

जैसे ही अय्यूब अलैहिस्सलाम ने उस पानी को अपना जिस्म पर लगाया.

अल्लाह के करम से ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी ख़त्म हो गई.और वह फिर से जवान हो गए.

और अल्लाह ने आसमान से सोना बरसाना शुरू कर दिया और अल्लाह ने ह़ज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीवी को भी जवानी बख्श दी.

और 23 बेटे और 27 बेटियां आता की और वह पहले से ज्यादा खुशहाल और शादमान हो गए.

बेशक अल्लाह अपने बंदों पर रहम फ़रमाने वाला है.

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ह़ज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी|story of Hazarat Ibrahim in hindi.

ह़ज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी.

क़ुर्बानी ईद-उल अजहा यादगार है ह़ज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की.

एक शब ह़ज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ख्वाब देखते हैं.के आवाज़े ग़ैब आती है.ऐ इब्राहिम मेरी राह में अपनी प्यारी चीज़ क़ुर्बान कर,फौरन इब्राहिम अलैहिस्सलाम बेदार होते हैं.

और जैसे ही सूरज नीकलता है.अपना सारा माल राहे खुदा में कुर्बान कर देते हैं. मुतमईन होकर सोचते हैं मैंने अपना सारा माल राहे खुदा में कुर्बान कर दिया.

रात को जैसे ही सोते हैं, फिर ख्वाब में आवाज़ें ग़ैब आती है.ऐ इब्राहिम मेरी राह में अपनी प्यारी चीज़ क़ुर्बान कर.इब्राहिम अलैहिस्सलाम बेदार हुए और दिल ही दिल में सोचने लगे,मेरी प्यारी चीज़ तो मेरा बेटा इस्माईल है.

ऐ मेरे अल्लाह क्या तु यह तो नहीं देखना चाहता कि मैं इस्माईल से ज़्यादा इश्क़ करता हूं .ऐ अल्लाह मेरे लाखों इस्माईल तुम पे क़ुर्बान.

बस फौरन फलस्तीन से मक्के की तरफ रवाना होते हैं.अपनी प्यारी बीबी हाजरा से कहते हैं. मेरे बेटे इस्माइल को तैयार कर,अच्छा लिबास पहना खुशबू लगा,मैं अपने दोस्त के पास अपने बेटे को ले जा रहा हूं.

फिर उसने अपने बेटे को तैयार किया और अल्लाह के नबी हजरत इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल को लेकर अपने कदमों को अल्लाह की रज़ा की तरफ माइल कर दिया.

रास्ते में ह़ज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे से कहा इस्माइल!पता है मैं तुम्हें कहां ले कर जा रहा हूं.
आपके बेटे ने कहा हां बाबा आप अपने दोस्त के पास लेकर जा रहे हैं.

तो आपके बाबा इब्राहिम ने कहा, इस्माइल! मैं तुम्हें अल्लाह के लिए कुर्बान करने जा रहा हूं.बस यह कहना था तो इस्माइल अलैहिस्सलाम ने कहा बाबा अगर अल्लाह की राहों में मुझे क़ुर्बान कर दिया जाए तो इससे बेहतर मेरे लिए क्या है.

लेकिन बाबा मेरी एक वसियत है, आप बूढ़ेे हैं! आप मेरे हाथ और पाव रस्सी से बांध लें, और मेरी आखिरी वसीयत है कि आप अपनी आंखों पर पट्टी बांध लें.

क्योंकि बाबा मुझे पता है आप मुझसे बेइंतहा प्यार करते हैं. आप मेरे लाश को तड़पते हुए देखे ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होगी.

बस अल्लाह के नबी इब्राहिम ने इस्माइल के हाथ-पाव बांधकर अपने आंखों पर पट्टी बांधी और छूरी को इस्माइल के गले पर रखा और कहा ऐ अल्लाह देख मैं अपनी प्यारी चीज़ इस्माइल को तेरी राह में क़ुर्बान कर रहा हूं.

ऐ अल्लाह अगर तू मुझे लाखों स्माइल आता करता तो मैं लाखों इस्माइल तेरी राह में कुर्बान कर देता…

बस यह कह कर जब गले पर छुरी फिरने लगे तो अल्लाह ने कहा जिब्राइल जाओ और जन्नत से जानवर लेकर इस्माइल की जगह पेश कर दो…
इब्राहिम अपने इश्क में क़ामयाब हुआ.

बस जैसे ही छुरी फिर गई खून बहने लगा और इब्राहिम ने अपनी आंखों से पट्टी जुदा किया तो देखे.इस्माइल सही व सलीम उनके साथ खड़े है.
और कुर्बानगाह में एक जानवर कुर्बान हो चुका.

फिर आवाज़ें ग़ैब आई ऐ इब्राहिम तु क़ामयाब हो गया,तु क़ामयाब हो गया…

और तेरी इस कुर्बानी को हर आने वाले इंसान के लिए यादगार रखेंगे.

आज भी लाखों करोड़ों अल्लाह के बंदे ह़ज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी को याद करके अल्लाह की राह में कुर्बानी देते हैं.

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जमीन पर जन्नत और फाहशाओ़ को ह़ूरें बना देने वाला शैतान| सबाह|in hindi.

जमीन पर जन्नत और फाहशाओ़ को ह़ूरें बना देने वाला शैतान| सबाह|in hindi.

ईरान के शहर में निशाापुर में तीन लड़के इल्म हासिल करते थे.यह तीनों बड़े गहरे दोस्त थे.
इनमें से एक लड़के का नाम उमर था,और बाकी दोनों लड़के का नाम ह़सन था.

एक दिन यह तीनों ने आपस में अहद किया के अगर हम में से कोई आला मुकाम पर पहुंच गया तो वह दोनों दूसरे साथियों की मदद करेगा.

मकतब के दूसरे लड़कों ने जब यह देखा तो खूब हंसे,के यह गरीब लड़के क्या किसी मुकाम पर पहुंचेंगे.लेकिन किस्मत उल्टा इन पर हंस रही थी. क्योंकि यह तीनों ही लड़कों ने अपने अपने शोबों में ऐसा नाम पैदा किया जो सदिया गुजर जाने के बावजूद दुनिया इन की सलाहियत के मोतारीफ है.

उमर नाम का लड़का आगे चलकर उमर खैयाम बना इसकी लाजवाल शायरी आज एशिया से ज्यादा यूरोप के लोगों को दीवाना बना हुए है.

हसन नाम का पहला लड़का निजाम उल मुल्क तुसी बना,उस दौर में इस्लामी मुल्क पर सहयोगी हुक्मरानी करते थे.इस मुल्क की सरहदें खुरासान से होकर मिश्र तक पहुंचती थी.
अपनी ज़हानत और सलाहियतों के दम पर ह़सन तुसी का वजीर-ए-आजम बना,और इस सल्तनत को ऐसा उरुज़ बख्शा के लोग बादशाह से ज्यादा इसके गुण गाते.

जबकि दूसरे ह़सन नाम के लड़के ने दुनिया में वह तबाही और फितना बरपा किया के तमाम इंसानियत को लरज़ा कर रख दिया.

यह लड़का हसन बिन सबाह के नाम से दुनिया भर में मशहूर हुआ मशहूर जमाना वीडियो गेम फिल्म Assassin Creed इसे हसन बिन सबाह से स्पाइड है. मकतब की तालीम मुकम्मल करने के बाद यह तीनों लड़के अपनी अपनी राह चले गए,

उमर खैयाम निशापुर में ही मुकीम रहे,और एक तवायफ से शादी की जिंदगी बहुत गुरमत में गुजर रही थी, की आपको किसी ने खबर दीे तुम्हारा फला दोस्त तुसी का वजीर-ए-आजम बन गया है.

लिहाजा आप अपने दोस्त निजाम उल मुल्क तुसी से मिलने पहुंचेे, इत्तेफाक से वहां उमर बिन सबाह भी उमर खैयाम से मिला.
यह दोनों हज़रात अपने दोस्त के सामने हाज़िर हुए, निजाम उल मुल्क तुसी ने उमर खैयाम को उसकी ख्वाहिश के मुताबिक एक बड़ी जागीर से नवाजा.

जब के ह़सन बीन सबाह को इसके ख्वाहिश के मुताबिक महल के कोतबाल का ओहदा इनायत किया.वह यह जागिर लेकर मुतमईन हो गए.

लेकिन हसन बिन सबाह जो फितरतन मक्कार था,अपने ही दोस्त और मोहसिन निजाम उल मुल्क की जड़े काटने लगा.
एक मर्तबा बादशाह ने निजाम उल मुल्क तुसी से दरियाफ्त किया,आप सल्तनत के मिली गोषवारा कितने मुद्दत में तैयार कर सकते हैं.

निजाम उल मुल्क तुसी ने सोच-विचारकर एक साल का वक्त मांगा,हसन बिन सबाह भी उस वक्त वहां मौजूद था. ये अचानक बोला कि मैं यह काम 40 दिन में कर सकता हूं.
बादशाह ने इसे इजाज़त दे दी.

लेकिन उसने कहा कि अगर मैं यह काम करने में कामयाब रहा तो आप निजाम उल तुसी की जगह
मुझे वजीर-ए-आजम के ओहदे से नवाजेंगे,इस बात पर निजाम उल मुल्क के साथ-साथ बादशाह को भी गुस्सा आया, मगर दोनों ने सब्र किया.

बहरेहाल 40 दिन के बाद वह एक गोषवारा लेकर बादशाहों के पास हाजिर हुआ,यह एक
ना मुकम्मल और झूठे आजादोशुमार पर मम्बनी गोषवारा था, बादशाह एक खुद भी ज़ीरत इंसान था, थोड़ी सी जांच पड़ताल के बाद जान गया कि यह झूठा है.
और उसने हसन बिन सबाह को मौत की सजा सुना दी. मगर निजाम उल मुल्क तुसी के कहने पर उसे माफ किया, और सिर्फ दरबार से दफा हो जाने को कहा.

उसके बाद हसन बिन सबाह मिस्र पहुंचा, वहां फातमीड हिलाफत कायम थी, यहां इसने स्माइली मजहब अख्तियार किया, और खालीफा मुसतनसर के बेटे नज़्ज़ार की तरफदारी करने लगा.
लेकिन मुसतनसर खलीफा का वज़िर बदर जमाली जो कि नीहायत ताक़वर था, उसने हसन बिन सबाह को ही इसाई लुटेरे के हवाले कर दिया.
यह अपनी चालाकी के बदौलत यहां से भी बच निकला, और मुख्तलिफ शहर का सफर करते हुए ईरान के शहर कज़वैन पहुंचा.

अब इसने एक नेक सीरत बुजुर्ग का रूप धारण किया, भोले-भाले लोग इसके फालसाफियाना बातों में आकर इसके मुरीद हो जाते थे.इसकी आंखों में एक ऐसी कशिश थी, के औरतें इसके तरफ देखते ही इसके गुरविदा हो जाती.

यह दौराने सफर जिस औरत से भी ताल्लुक कायम करता, उसका नाम और पता एक डायरी में लिख लेता.
इसी तरह यह हुनरमंद अफराद का भी नाम और पता डायरी में लिख लेता.

काज़मैन में मौजूद एक किला अलमौत हसन बिन सबाह को बहुत पसंद आया, और इसने यहीं अपना मसकन बना लिया, इस किले का मालिक हसन बिन सबाह का अकीदतमंद था.

लेकिन हसन बिन सबाह के मुरि्दों की तादात में इजाफा हुआ तो उसने इस किले का मालिक को ही निकाल बाहर किया.

यह किला काफी बड़े रकबे पर मुशतमील था. इसके अंदर बहुत सारे महल थी इसी दौरान हसन बिन सबाह जो कि एक हकीम भी था.इस पर हशीश की पत्तियों का इनकेशाफ हुआ, इसे इंडिया और पाकिस्तान में भंग कहा जाता है.

इसने अपने मुरीदों को लूट मार के काम पर लगाया और इस से हासिल होने वाले दौलत से किले के अंदर एक खुफिया जन्नत तामीर करवाई.

दौराने सफार इसने जीस खूबसूरत औरत और हुनरमंद आफराद के नाम लिखे थे.इन्हे इस किले में बुलवा लिया, इस किले में दूध की मसनुई नहर बहाइ गई, सोने और चांदी के महल तामिर किए गए, ऐसे दरख़्त लगाए गए जिनका साया निहायत गहरा था. खूबसूरत तरीना फाहीशा औरत को हूरों का नाम दिया गया.

अब जिस मुरीद को जन्नत का सैर कराना मकसद होता, उसे भंग के नशे में इस मसनुई जन्नत में छोड़ दिया जाता, और कुछ देर बाद उसे बाहर निकाल लिया जाता.

अब वह इस जन्नत में जाने के लिए किसी भी हद से गुजरने के लिए तैयार होता. इस प्रकार हसन बिन सबाह ने फिदाइयों की एक ऐसी फौज तैयार करली, जिसे मौत ज़िन्दगी से ज्यादा अज़ीज़ थी.

और इस फौज के जरिए हसन बिन सबाह ने अपने बचपन के दोस्त निजाम उल मुल्क तुसी और हसन अब्बासी खुलफ़ा से लेकर दुनिया ए इस्लाम के बड़े-बड़े नामों को कत्ल करवा दिया,न सिर्फ इस्लामी दुनिया बल्कि इसके फिदायीन के पहुंच यौरप के बादशाहत तक थी.

छोटे-छोटे रियासतें इसके सर से महफूज रहने के लिए खराज पेश करती है, उसने अपने कीले अमौत और मसनुई जन्नत के कानून इस क़दर सख्त बना रख्खै थे कि रोज़ दो तीन गुलाम कनीज़े सजा-ए-मौत का शिकार बनती.

यहां तक कि अपने दो सगे बेटे को क़त्ल करवा दिए, और मुरिदों में एहतराम और दैहसत का यह आलम था.के उसके उंगली की एक इशारे पर दर्जनों लोग मौत को गले लगा लेते, उसने अपने किला अलमौत और मसनूई जन्नत में छोटे छोटे खुफिया आईने इस तरह नसफ किए थे कि cc tv कैमरा के काम करते थे.
और इस से तमाम किले का राज मालुम रहता.

इसके मुरीद हसन बिन सबाह का रूहानी ताक़त समझते.
और समझते हसन बिन सबाह हर चीज़ अपने बजरीयाए कशफ के जरिए जान लेता है.

मलिक शाह सलजोक ने इस फीतने के खात्मे के लिए, कई मर्तबा फौज कशी की मगर किला अलमौत पहाड़ पर होने की वजह से नाकाम होते.
हसन बीन सबाह ने दुनिया में 35 साल तक कत्ल व गारतगरी का बाजार गर्म रखा.और वासीले जहन्नम हुआ.

बाद में इसके जानशिनों ने डेढ़ सौ साल तक मखलूक ए खुदा की नाक में दम किए रखा.
यहां तक कि हलाकू खान का गुज़र इस इलाके से हुआ, और उसने यह किला सफा ए हस्ती मिटा दिया.

एक एक सिपाही को चुन-चुनकर कत्ल कर डाला. मगर हसन बिन सबाह आज भी सिर्फ एशिया ही में नहीं बल्कि यूरोप ममालिक में भी दहशत की अलामत माना जाता है.

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शहाबुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज का घमासान लड़ाई एक ऐतिहासिक जंगी वाक्या

शहाबुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज का घमासान लड़ाई एक ऐतिहासिक जंगी वाक्या

शहाबुद्दीन गौरी सन 1160 ईस्वी को अफगानिस्तान के इलाक़े गौर के में पैदा हुए. शहाबुद्दीन गौरी सल्तनत ए गौरिया का दूसरा हुक्मरान था.

सैफुद्दीन गौरी के इंतकाल के बाद शहाबुद्दीन गौरी के भाई गयासुद्दीन सल्तनत ए गोरिया के तख्त पर बैठा. और उसने 1173 में गजनी को मुस्तकिल तौर पर फतह करके उसने शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी को गज़नी में तख्त पर बिठाया.

गयासुद्दीन ने इस दौरान हीरात और बलख में भी फतह कर लिया, और हीरात को अपना दारुल हुकूमत बनाया, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी अगरचे अपने भाई का नायब था, लेकिन उसने गजनी में एक आजाद हुक्मरान की तरह हुकूमत की.

और मौजूदा पाकिस्तान और सुमाली हिंदुस्तान को फतह करके तारीख में मुस्तकिल मकाम पैदा कर लिया, अपने भाई गयासुद्दीन के इंतकाल पर वह पूरी गौरी सल्तनत का हुक्मरान बन गया.

शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के फ़ौजी करवाही, पाकिस्तान के इलाके से शुरू हुई वह दरेगोमल से पाकिस्तान में दाखिल हुए, उसने सबसे पहले मुल्तान और ऊच पर हमला किया.

शहाबुद्दीन गौरी ने 1175 में मुल्तान और ऊच दोनों फतह कर लिए, उसके बाद 1179 में पेशावर और 1185 में देवल को फतह कर लिया, इस तरह उन्होंने गोरी हुकूमत को बाहरी अरब के शाहील तक पहुंचा दिया.

लाहौर और उसके आसपास का इलाका उस वक्त तक गजनी खानदान के कब्जे में था। शहाबुद्दीन गौरी ने 1186 में लाहौर पर हमला करके उसने गजनी खानदान की हुकूमत को बिल्कुल खत्म कर दिया.

लाहौर पर कब्जा करने के बाद वह भटिंडा की तरफ बढ़ा और वहां भी अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.
उस वक्त दिल्ली और अजमेर पृथ्वीराज चौहान की कब्ज़े में था.

पृथ्वीराज चौहान ने जब यह सुना कि शहाबुद्दीन गौरी ने भटिंडा फतह कर लिया है, तो वह दो लाख की जबरदस्त फौज लेकर शहाबुद्दीन गौरी से लड़ने के लिए निकला,
दिल्ली के शुमाल मगरीब में करनाल के करीब एक मैदान में दोनों तरफ की फौज में घमासान की लड़ाई हुई.

इस लड़ाई में शहाबुद्दीन गौरी के कलील फौज की शिकस्त हुई,और वह बुरी तरह जख्मी हो गया, जख्मी हालत में एक सिपाही ने उसको बचाकर मैदान-ए-जंग से ले गया.

सिपाही अपने जरनल शहाबुद्दीन गौरी को
ना देखकर बुजदिल हो गए और मैदान-ए-जंग से भाग निकले.

इधर शहाबुद्दीन गौरी को जख्मी हालत में लाहौर लाया गया, जहां से उसे गजनी पहुंचाया गया.

शहाबुद्दीन गौरी को इस शिकस्त का कितना रन्ज हुआ कि उसने 1 साल तक हर तरह की ऐश व आराम को छोड़कर बेचैनी की जिंदगी गुजारी.
यहां तक कि उसने अपने जरनैल से भी बात करना छोड़ दिया था.

फिर उसने अपने तमाम जरनैल को तरबीयत यफता फौज तैयार करने का हुक्म दिया.
कुछ अरसा बाद एक लाख बीस हजार सिपाहियों पर मुसतमील एक बहुत बड़ी फौज लेकर पिछले शिकस्त का बदला लेने के लिए.

दिल्ली की तरफ रवाना हुआ, उधर जब पृथ्वीराज को पता चला तो उसने भी भारत के ढाई सौ राजाओं की मदद से तीन लाख से ज्यादा फौज और कई हजार जंगी हाथी जमा कर लिए.
और जंग के लिए रवाना हुआ.

दोनों तरफ की फौज एक बार फिर
तराइन अतरौली के मैदान में आमने-सामने हुई.

पृथ्वीराज चौहान ने शहाबुद्दीन गौरी को एक खत लिखा और नसीहत की अपने सिपाहियों के हाल पर रहम खाओ और उन्हें लेकर गजनी वापस चले जाओ हम तुम्हारी जान बख्श देंगे और पीछा नहीं करेंगे.

लेकिन शहाबुद्दीन गौरी ने निहायत जूर्रतमंदाना जवाब दिया के वह अपने भाई के हुक्म के मुताबिक अमल करता है.

इसलिए बगैर जंग की वापसी मेरे लिए नामुमकिन है अगले दिन दोनों फौज का आमना सामना हुआ एक बार फिर घमासान की लड़ाई शुरू हुई.

पृथ्वीराज के तीन लाख से ज्यादा फौज के मुकाबले में शहाबुद्दीन गौरी की एक लाख फौज मदे मुकाबिल थी.

जंग सूरज निकलने से पहले शुरू हुई शहाबुद्दीन गोरी के फौज इतनी जवान मर्दी से लड़ी कि पृथ्वीराज की फौज की कदम डगमगाने लगी शाम होने से पहले पहले जंग का नतीजा सामने आ चुका था.

शहाबुद्दीन गौरी को फतह हासिल हुई और पृथ्वीराज की शिकस्त हुई पृथ्वीराज ने मैदान-ए-जंग से भाग कर अपनी जान बचाई.
मगर दरिया ए सरस्वती के पास से गिरफ्तार हुए.

उसके बाद सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी के हुकुम पर उसे क़त्ल कर दिया गया,पृथ्वीराज को शिकस्त देने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने दिल्ली और अजमेर को भी फतह कर लिया.

और उसके सिपासलार मलक मोहम्मद इब्ने बख्तियार खिलजी ने आगे बढ़कर बिहार और बंगाल को भी फतह कर लिया.

इस तरह शहाबुद्दीन गोरी ने एक अज़ीमोशान सल्तनत की बुनियाद रखी…

1206 में पंजाब में बगावत शुरू हुई शहाबुद्दीन गौरी फौरन पंजाब आया और बगावत को कुचल कर वापस जा रहा था,के रास्ते में दरिया के किनारे,उन पर एक हमला किया गया.यह हमला जानलेवा साबित हुआ और युं हिंदुस्तान की तारीख में एक नया बाब रकम करके इस दुनिया ए फानी से रुखसत हो गए.

वफात के बाद उनके वफादार गुलाम और नायब कुतुबुद्दीन ऐबक ने
एक मुस्तकिल इस्लामी हुकूमत यनि सल्तनत दिल्ली को खानदाने गुलमा के ज़ेरे असर कायम कर ली.

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खुशियों की चाहत हर कीसी को होता है. हर कोई चाहता है कि उसकी जिंदगी में